ऊदा देवी पासी – स्वतंत्रता संग्राम की बहुजन वीरांगना !!

आजादी की लड़ाई में समाज के सभी वर्गों और जातियों के लोग थे। इसके बावजूद इतिहास में उन्हीं लोगों के नाम दर्ज किया गया, जो समाज के अगड़े वर्ग से आते थे।

इसी कड़ी में हम 1857 के स्वतंत्रता आन्दोलन की नायिका ऊदा देवी पासी को देख सकते हैं। उन्होंने 32 ब्रिटिश सैनिकों को मार गिराया और अंतत: वीरगति को प्राप्त हुई। उनकी वीरता का ब्रिटिश अधिकारियों पर इतना जबरदस्त असर रहा कि ऊदा देवी की वीरता के बारे भारतीय इतिहासकारों से अधिक ब्रिटिश पत्रकारों और अधिकारियों ने लिखा है।

कहना ना होगा कि उन्हें वह यश और सम्मान नहीं मिला जिसकी वह हकदार थीं। शायद इसलिए कि वह किसी राजघराने या सामंती परिवार में नहीं, बल्कि एक गरीब दलित परिवार में पैदा हुई थीं और एक मामूली सैनिक थीं।

उत्तर प्रदेश के लखनऊ के पास उजिरियांव गांव की ऊदा देवी एक दलित वर्ग की पासी जाति में पैदा हुई थीं। जब वाजिद अली शाह ने महल की रक्षा के उद्देश्य से स्त्रियों का एक सुरक्षा दस्ता बनाया तो उसके एक सदस्य के रूप में ऊदा देवी को भी नियुक्त किया। अपनी बहादुरी और तुरंत निर्णय लेने की उनकी क्षमता से नवाब की बेगम और देश के प्रथम स्वाधीनता संग्राम की नायिकाओं में एक बेगम हजरत महल बहुत प्रभावित हुईं। नियुक्ति के कुछ ही दिनों बाद में ऊदा देवी को बेगम हज़रत महल की महिला सेना की टुकड़ी का कमांडर बना दिया गया।

16 नवंबर 1857 को कोलिन कैम्पबेल के नेतृत्व में अंग्रेज सैनिकों ने एक सोची-समझी रणनीति के तहत सिकंदर बाग़ की उस समय घेराबंदी की, जब विद्रोही सैनिक या तो सो रहे थे या बिल्कुल ही असावधान थे। ऊदा के नेतृत्व में वाजिद शाह की स्त्री सेना की टुकड़ी भी हमले के वक्त इसी बाग में थी। महिला टुकड़ी के साथ मौजूद ऊदा देवी ने पराजय निकट देखकर पुरुषों के कपडे पहन लिए। हाथों में बंदूक और कंधों पर भरपूर गोला-बारूद लेकर वह पीपल के एक ऊंचे पेड़ पर चढ़ गयी।

ब्रिटिश सैनिकों को मैदान के उस हिस्से में आता देख ऊदा देवी ने उनपर फायरिंग शुरू कर दी। पेड़ की डालियों और पत्तों के पीछे छिपकर उसने हमलावर ब्रिटिश सैनिकों को सिकंदर बाग़ के उस हिस्से में तब तक प्रवेश नहीं करने दिया था जबतक उनका गोला-बारूद खत्म नहीं हो गया। ऊदा देवी ने अकेले ब्रिटिश सेना के दो बड़े अफसरों कूपर और लैम्सडन सहित 32 अंग्रेज़ सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया था। गोलियां खत्म होने के बाद ब्रिटिश सैनिकों ने पेड़ को घेरकर उनपर अंधाधुंध फायरिंग की। कोई उपाय न देख जब वह पेड़ से नीचे उतरने लगी तो उन्हें गोलियों से छलनी कर दिया गया।

लाल रंग की कसी हुई जैकेट और पैंट पहने ऊदा देवी की लाश जब पेड़ से ज़मीन पर गिरी तो उसका जैकेट खुल गया। कैम्पबेल यह देखकर हैरान रह गया कि वीरगति प्राप्त वह बहादुर सैनिक कोई पुरुष नहीं, एक महिला थी। कहा जाता है कि ऊदा देवी की स्तब्ध कर देने वाली वीरता से अभिभूत होकर कैम्पबेल ने हैट उतारकर उन्हें सलामी और श्रद्धांजलि दी थी।

ऊदा देवी के शौर्य, साहस और शहादत पर भारतीय इतिहासकारों ने बहुत कम, अंग्रेज अधिकारियों और पत्रकारों ने ज्यादा लिखा। ब्रिटिश सार्जेण्ट फ़ॉर्ब्स मिशेल ने अपने एक संस्मरण में बिना नाम लिए सिकंदर बाग में पीपल के एक बड़े पेड़ के ऊपर बैठी एक ऐसी स्त्री का उल्लेख किया है जो अंग्रेजी सेना के बत्तीस से ज्यादा सिपाहियों और अफसरों को मार गिराने के बाद शहीद हुई थी। लंदन टाइम्स के तत्कालीन संवाददाता विलियम हावर्ड रसेल ने लड़ाई का जो डिस्पैच लंदन भेजा उसमें उसने पुरुष वेश में एक स्त्री द्वारा पीपल के पेड़ से फायरिंग कर अंग्रेजी सेना को भारी क्षति पहुंचाने का उल्लेख प्रमुखता से किया गया था। लंदन के कई दूसरे अखबारों ने भी ऊदा की वीरता पर लेख प्रकाशित किए थे। संभवतः लंदन टाइम्स में छपी खबरों के आधार पर ही कार्ल मार्क्स ने भी अपनी टिप्पणी में इस घटना को समुचित स्थान दिया।

आज बहुजन विचार धारा और साथियों की वजह से ऊदा देवी को वह सम्मान मिलने लगा है जिनकी वह हक़दार है । ऊदा देवी पासी आज बहुजन नायिका के तौर पर स्थापित हो चुकी है । आज उनके बलिदान दिवस पर बहुजन समाज में उन्हें याद किया जा रहा है ।

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s