बेशर्म फूल !!

बेशर्म फूल !!

क्या कोई फूल बेशर्म भी हो सकता है ? जी हाँ गाँव देहात में बेहा या बेहया नाम का पौधा होता है इसके फूल को बेहया या बेहा कहा जाता है । बहबेहया, जिसका मतलब बेशरम होता है हैं, उसके के फूलों पर नज़र तो सबकी ही पड़ती है, उन्हें ठहरकर देखता कोई नहीं।

तालाबों, पोखरों, नदियों के किनारों और कीचड़ भरे गड्ढों में बेतरतीब-सी झाड़ियों में इफ़रात से मिलने वाला यह गंधरहित लेकिन खूबसूरत फूल दुनिया के कुछ सबसे अभागे फूलों में एक है। कोई इन्हें अपने घर के लॉन में पनपने नहीं देता। न यह देवताओं पर चढ़ता है, न स्त्रियों का शृंगार बनता है। दुनिया के किसी प्रेमी ने अपनी प्रेमिका को उपहार में भी नहीं दिया होगा यह फूल। इनकी झाड़ियां तो जलावन में, बाड़ बनाने अथवा औषधि के तौर पर काम आती हैं।

बचपन में तालाब और नदियों के किनारे बहुत देखा था । इसे बेहया इसलिए भी कहते है क्योंकि यह हर परिस्थियाँ में उग जाता है और बढ़ते रहता है । कितनी ही बार इसे उखाड़ कर फेंकिए यह फिर उग आता है शायद इसलिए इसे बेहया कहते है ।

इनके फूल और पौधों को गाय – बकरियाँ भी नहीं खाती थी । पर अगर कोई जानवर इसे एकाध बार खा लेते थे तो उन्हें इसे बार बार खाने की आदत पड़ जाती थी । और जो जानवर इसे खाने लगता था वह दिनों दिन पतला होते जाता था । क्योंकि इसमें औषधि वाले गुण भी होते है वह शायद जानवरों के लिए नुक़सान दायक होता है ।

गाँवों में तो इसकी उपेक्षा ही होती थी पर आजकल शहरों में इसके फूल की सुंदरता की वजह से लगाया जाने लगा है ।

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