भारतीय लोकमानस में आज भी जिंदा है बौद्ध परंपरा!!!जानिए आम जनमानस में उपयोग किए जाने वाले नामों से!!

भारत देश बौद्ध सभ्यता का देश है यह कदम कदम पर पता चलता है । जहां भी खुदाई करिए बुद्ध सभ्यता के अवशेष मिलते है ।

बहुत कोशिश की गई बौद्ध सभ्यता को पूरी तरह से ख़त्म कर दिया जाय । पर कुछ बातें आम जनमानस में परम्परा रूप में पीढ़ी दर पीढ़ी चली आती है ।

ऐसे ही बौद्ध परंपरा के सबूत भारत में रखे जाने वाले नामों से मिलते है ।

उदाहरण के लिए अशोक के द्वारा बनाए साँची स्तूप को ही ले लीजिए । बौद्ध सभ्यता में स्तूप बनाए जाने का रिवाज था और बहुत से आम जन स्तूप बनाने के लिए आर्थिक योगदान देते थे । स्तूप बनाने में सहयोग करने वाले लोगों के नाम में दान कर्ता के रूप दर्ज किया जाता है ।

साँची के स्तूप के दान – अभिलेखों में जो नाम मिलते हैं, वे रोचक हैं और जिनकी परंपरा आज तक है.। एक का नाम है – फगुनसंभतु, ये फागुन में जन्म लिए होंगे, एक दूसरे भिक्खु का नाम है – विसाख…..ये वैसाख में जन्म लिए होंगे ….

आज भी गाँवो में लड़की हुई तो विसाखा और लड़का हुआ तो विसाख…. यह तर्ज़

आज भी चलता है…छठ के दिन…..लड़की हुई तो छठिया और लड़का हुआ तो छठु ।

होली के दिन जन्म लिया तो होरी ,आज भी गाँवों में जेठू ( ज्येष्ठ), फागू (फाल्गुन ), फगुनी, भदईं ( भाद्रपद ) जैसे नाम मिलेंगे….

विसाखा ने श्रावस्ती में बौद्ध विहार बनवाया था जो वैशाख में जन्मी थी ।

बौद्ध सभ्यता में महिलाओं के नाम के आगे देवी नहीं देई लगाया जाता था । उदाहरण के लिए राद देयी , रूम्मन देयी जैसे नाम आज भी पुराने लोगों के मिल जाते है ।

नामों में बहुत हेरफेर हुआ है । ताकि बौद्ध सभ्यता ख़त्म हो जाए जैसे लुंमिनि ही गौतम बुद्ध की माँ का वास्तविक नाम था, महामाया नाम बाद का है। जैसे बुद्ध का सिद्धार्थ नाम बाद का है, पहले का नाम सुकिति है। जैसे बुद्ध की पत्नी का यशोधरा नाम बाद का है, पहले का नाम कच्चाना है। महामाया, सिद्धार्थ और यशोधरा जैसे नाम बुद्ध की जीवनी में तब जुड़े, जब संस्कृत का आगमन हुआ। बुद्ध के समय में संस्कृत भाषा नहीं थी। इसलिए हमहामाया, सिद्धार्थ और यशोधरा जैसे संस्कृत नामों बौद्ध सभ्यता में नहीं मिलते ।

बौद्ध सभ्यता को लेकर भी भ्रांतियाँ फैलाई गई है । बौद्ध सभ्यता ढाई हज़ार साल का इतिहास बताया जाता है । जबकि भारत और आसपास बौद्ध सभ्यता पाँच हज़ार साल पुरानी है ।

यह ग़लत भ्रांतियाँ फैली है क्योंकि गौतम बुद्ध को ही बौद्ध सभ्यता का अविष्कारक माना जाता है । जबकि गौतम बुद्ध से पहले भी बौद्ध सभ्यता थी ।गौतम बुद्ध ने केवल उस सभ्यता को आगे बढ़ाया था । तीसरी शताब्दी में फहयाँन और सातवी शताब्दी में हेनसांग की यात्राओं में भी इसका विवरण मिलता है ।

कुल मिलाकर 28 बुद्ध हुए….28 बुद्धों में चौथे दीपंकर बुद्ध थे और अट्ठाइसवें गोतम बुद्ध थे….

छठी शताब्दी ईसा पूर्व में गोतम बुद्ध हुए और दीपंकर बुद्ध उनसे 24 पीढ़ी पहले सिंधु घाटी सभ्यता के समय में हुए….

28 बुद्धों में से दो बुद्धों का बोधिवृक्ष पीपल है….एक दीपंकर बुद्ध का और दूसरा गौतम बुद्ध का….

सिंधु घाटी सभ्यता में पीपल वृक्ष की पवित्रता की जो धाक है…. वह गोतम बुद्ध के कारण नहीं… बल्कि दीपंकर बुद्ध के कारण है.।

हड़प्पा / सिंधु सभ्यता में मिली पीपल की पत्तियाँ

फाहियान ने दीपंकर बुद्ध को पुष्पार्पण किए जाने का उल्लेख नगार जनपद में किया।

तस्वीरें दीपंकर बुद्ध और सिंधु घाटी सभ्यता में पीपलांकन की हैं….

(राजेंद्र प्रसाद : प्रोफ़ेसर ,इतिहासकार और भाषा वैज्ञानिक द्वारा की गई खोजे और उनके लेखों के आधार पर यह लेख आधारित है )

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