आर्टिकल 370, आंबेडकर और राष्ट्रवाद

● दिलीप मंडल

राष्ट्र की मुख्यधारा में बाबासाहेब डॉक्टर भीमराव आंबेडकर की विधिवत स्थापना संयोग से उसी दौर में हो रही है, जब देश में राष्ट्र और राष्ट्रवाद को लेकर एक तीखी बहस चली है. एक ओर सभी राजनीतिक दल उन्हें अपना आदर्श जताना चाह रहे हैं, दूसरी ओर राष्ट्रवाद को लेकर बहस देश के विश्वविद्यालयों से शुरू होकर, जीवन के विविध क्षेत्रों में व्याप्त हो गयी है और चाहे-अनचाहे हम सब इसके हिस्सेदार बन गये हैं.

यह स्थिति इसलिए भी है क्योंकि राष्ट्र निर्माण के बाबासाहेब के सपनों पर अब तक गंभीरता से गौर नहीं किया गया है, वरना राष्ट्र और राष्ट्रवाद से जुड़े कई जटिल सवालों का मुकाबला करने के लिए हम ज्यादा समर्थ और सक्षम होते.

बाबासाहेब को जानने और समझने की सबसे बड़ी सीमा यह रही है कि या तो उनकी अनदेखी की गयी, या फिर उनकी पूजा की गयी. ज्यादा लोग ऐसे हैं, जिन्होंने बाबासाहेब के जीवन के किसी एक पहलू को उनका पूरा स्वरूप मान लिया और उस टुकड़े में ही वे बाबासाहेब का समग्र चिंतन तलाशते रहे.

बाबासाहेब के लोकजीवन का विस्तार इतना बड़ा और विशाल है कि उसके किसी एक खंड की विशालता से विस्मित होना बिल्कुल मुमकिन है. कई लोग इस बात से चकित हैं कि अछूत परिवार में पैदा हुआ एक बच्चा अपने दौर का सबसे बड़ा विद्वान कैसे बन गया. कोई कहता है कि बाबासाहेब संविधान निर्माता थे, जो कि वे थे.

कुछ लोगों की नजर में बाबासाहेब अपने दौर के सबसे बड़े अर्थशास्त्री थे, जिनके अध्ययन के आलोक में रिजर्व बैंक की स्थापना हुई, भारतीय मुद्रा और राजस्व का जिन्होंने विस्तार से अध्ययन किया. कई लोगों की नजरों में बाबासाहेब दलित उद्धारक हैं, तो कई लोग हिंदू कोड बिल के रचनाकार के रूप में उन्हें ऐसे शख्स के रूप में देखते हैं, जिन्होंने पहली बार महिलाओं को पैतृक संपत्ति में हिस्सा दिलाने की पहल की और महिला समानता की बुनियाद रखी. श्रम कानूनों को लागू कराने से लेकर नदी घाटी परियोजनाओं की बुनियाद रखनेवाले शख्स के रूप में भी बाबासाहेब को जाना जाता है. बाबासाहेब के कार्यों और योगदानों की सूची बेहद लंबी है.

लेकिन, इन सबको जोड़ कर बाबासाहेब की जो समग्र तसवीर बनती है, वह निस्संदेह एक राष्ट्र निर्माता की है. बाबा साहेब का भारतीय राष्ट्र कैसा है? क्या वह राष्ट्र एक नक्शा है, जिसके अंदर ढेर सारे लोग हैं? क्या राष्ट्र किसी झंडे का नाम है, जिसे कंधे पर लेकर चलने से कोई राष्ट्रवादी बन जाता है?

क्या राष्ट्र एक तसवीर है, जिसमें एक महिला भगवा ध्वज लेकर शेर की पीठ पर बैठी है, जिसे राष्ट्रमाता मान कर उसकी जय-जयकार करना जरूरी है? क्या भूगोल ने, पहाड़ और नदियों ने अपनी प्राकृतिक सीमाओं से घेर कर जमीन के एक टुकड़े को राष्ट्र का रूप दे दिया है? या फिर, क्या हम इसलिए एक राष्ट्र हैं कि हमारे स्वार्थ और हित साझा हैं?

बाबासाहेब का राष्ट्र इन सबसे अलग है. धर्म, भाषा, नस्ल, भूगोल या साझा स्वार्थ को, या फिर इन सबके समुच्चय को, बाबासाहेब राष्ट्र नहीं मानते. बाबासाहेब का राष्ट्र एक आध्यात्मिक विचार है. वह एक चेतना है. हम एक राष्ट्र हैं, क्योंकि हम सब मानते हैं कि हम एक राष्ट्र हैं.

इस मायने में यह किसी स्वार्थ या संकीर्ण विचारों से बेहद ऊपर का एक पवित्र विचार है. इतिहास के संयोगों ने हमें एक साथ जोड़ा है, हमारा अतीत साझा है, हमने वर्तमान में साझा राष्ट्र जीवन जीना तय किया है और भविष्य के हमारे सपने साझा हैं, और यह सब है इसलिए हम एक राष्ट्र हैं. राष्ट्र की यह परिकल्पना बाबासाहेब ने यूरोपीय विद्वान अर्नेस्ट रेनॉन से ली है, जिनका 1818 का प्रसिद्ध वक्तव्य ‘ह्वाट इज नेशन’ आज भी सामयिक दस्तावेज है.

संविधान सभा में पूछे गये तमाम सवालों का जवाब देने के लिए जब बाबासाहेब 25 नवंबर, 1949 को खड़े होते हैं, तो वे इस बात को रेखांकित करते हैं कि भारत आजाद हो चुका है, लेकिन उसका एक राष्ट्र बनना अभी बाकी है. बाबासाहेब कहते हैं कि ‘भारत एक बनता हुआ राष्ट्र है.

अगर भारत को एक राष्ट्र बनना है, तो सबसे पहले इस वास्तविकता से रूबरू होना आवश्यक है कि हम सब मानें कि जमीन के एक टुकड़े पर कुछ या अनेक लोगों के साथ रहने भर से राष्ट्र नहीं बन जाता. राष्ट्र निर्माण में व्यक्तियों का मैं से हम बन जाना बहुत महत्वपूर्ण होता है.’

वे चेतावनी भी देते हैं कि हजारों जातियों में बंटे भारतीय समाज का एक राष्ट्र बन पाना आसान नहीं होगा. सामाजिक व आर्थिक जीवन में घनघोर असमानता और कड़वाहट के रहते यह काम मुमकिन नहीं है. अपने बहुचर्चित, लेकिन कभी न दिये गये, भाषण ‘एनिहिलेशन ऑफ कास्ट’ में बाबासाहेब जाति को राष्ट्र विरोधी बताते हैं और इसके विनाश के महत्व को रेखांकित करते हैं.

बाबासाहेब की संकल्पना का राष्ट्र एक आधुनिक विचार है. वे स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की बात करते हैं, लेकिन वे इसे पश्चिमी विचार नहीं मानते. वे इन विचारों को फ्रांसिसी क्रांति से न लेकर, बौद्ध परंपरा से लेते हैं. संसदीय प्रणालियों को भी वे बौद्ध भिक्षु संघों की परंपरा से लेते हैं.

स्वतंत्रता और समानता जैसे विचारों की स्थापना संविधान में नियम कानूनों के जरिये की गयी है. इन दो विचारों को मूल अधिकारों के अध्याय में शामिल करके इनके महत्व को रेखांकित भी किया गया है. लेकिन इन दोनों से महत्वपूर्ण या बराबर महत्वपूर्ण है बंधुत्व का विचार. क्या कोई कानून या संविधान दो या अधिक लोगों को भाईचारे के साथ रहना सिखा सकता है? क्या कोई कानून मजबूर कर सकता है कि हम दूसरे नागरिकों के सुख और दुख में साझीदार बनें और साझा सपने देखें? क्या इस देश में दलित उत्पीड़न पर पूरा देश दुखी होता है? क्या मुसलमानों या ईसाइयों पर होनेवाले हमलों के खिलाफ पूरा देश एकजुट होता है?

क्या आदिवासियों की जमीन का जबरन अधिग्रहण राष्ट्रीय चिंता का कारण हैं? दुख के क्षणों में अगर नागरिकों में साझापन नहीं है, तो जमीन के एक टुकड़े पर बसे होने और एक झंडे को जिंदाबाद कहने के बावजूद हम लोगों का एक राष्ट्र बनना अभी बाकी है. राष्ट्र बनने के लिए यह भी आवश्यक है कि हम अतीत की कड़वाहट को भूलना सीखें. अमूमन किसी भी बड़े राष्ट्र के निर्माण के क्रम में कई अप्रिय घटनाएं होती हैं, जिनमें कई की शक्ल हिंसक होती है और वे स्मृतियां लोगों में साझापन पैदा करने में बाधक होती हैं. इसलिए जरूरी है कि खासकर विजेता समूह, उन घटनाओं को भूलने की कोशिश करे.

राष्ट्र जब लोगों की सामूहिक चेतना में है, तभी राष्ट्र है. बाबासाहेब चाहते थे कि भारत के लोग, तमाम अन्य पहचानों से ऊपर, खुद को सिर्फ भारतीय मानें. राष्ट्रीय एकता ऐसे स्थापित होगी. वर्तमान विवादों के आलोक में, बाबासाहेब के राष्ट्र संबंधी विचारों को दोबारा पढ़े जाने और आत्मसात किये जाने की जरूरत है.

( लेख दिलीप मंडल जी के फेसबुक से कॉपी किया गया है )

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