दिलीप मंडल : मैग्सेसे ही नहीं, नोबेल तक के निर्विवाद पात्र! -एच.एल दुसाध

गत 2 अगस्त को जब चर्चित पत्रकार रवीश कुमार को एशिया का नोबेल कहे जाने वाले मेगसेसे पुरस्कार मिलने की घोषणा हुई तो सोशल मीडिया पर जश्न का सैलाब पैदा हो गया था . इस जश्न में सवर्णों से कही ज्यादा बहुजन समाज के लोग डूबते नजर आये. इस पुरस्कार को लेकर एक ऐसा जनोंन्माद पैदा हुआ था, जिसका साक्षात् हमने कभी अन्ना- केजरी के प्रति किया था. ऐसे में लोगों को जश्न में डूबते देख मैंने भी यह सन्देश पोस्ट कर दिया .‘हालांकि मेरी नज़रों में रवीश की पत्रकारिता मुख्यतः सवर्णवादी सत्ता के लिए सेफ्टी वॉल्व का काम करती है, बावजूद इसके ‘मैग्सेसे पुरस्कार’ के लिए उन्हें बधाई’

मेरे इस पोस्ट जो पहला कमेन्ट आया वह यह था,’जनाब सच कहा आपने रवीश कुमार भेड़ की खाल मे छिपा भेड़िया है’. उसके बाद तो मेरे ऊपर बहुजनवादी मित्रों के हमले शुरू हो गए. इसकी शुरुआत करते हुए एक व्यक्ति ने लिखा ,यह तथाकथित बहुजनवादिओं की कुंठा है कि भटकाव’. अच्छा नहीं लगा उनका जवाब.जब बहुजन सवर्णों से कहीं ज्यादा दीवानगी दिखा रहे हैं, तब बहुजनवादियों के लिए ‘कुंठा’ का इस्तेमाल क्या युक्तिसंगत है! अतः मैंने जवाब में लिखा,’मैं बहुजनवादियों की बात तो नहीं जानता किन्तु यह पोस्ट दुसाध स्पेशल दृष्टि का सृजन है. रवीश की पत्रकारिता सवर्णवादी सत्ता का सेफ्टी वॉल्व है , इस बात की उपलब्धि विशुद्ध कुंठित और भटके हुए लोग नहीं कर सकते. इसके लिए आपको अपना स्तर दुसाध के करीब ले जाना होगा. बहरहाल जिन्हें रवीश की पत्रकारिता में क्रांतिकारिता की झलक मिलती है, उन्हें उनकी दृष्टि मुबारक हो’. शायद उन्होंने भी महसूस किया की रवीश में क्रांतिकारिता वाली बात नहीं है, इसलिए उन्होंने जवाब में लिखा,’ रवीश की पत्रकारी में क्रांति ढूढना बालू में सुई ढूढना है । आप ढूढतें ही क्यों है । ऐसे सभी पत्रकार जो बड़ी कारपोरेट हाऊस के साथ जुड़े है उनकी नीतियों पर ही काम करतें है । चाहे दलित पत्रकार हो या पिछड़ा । सत्ता का अपना तर्क होता है । उसे समझियें।‘ मतलब साफ़ है, आप रवीश की पत्रकारिता में क्रांतिकारिता मत ढूंढिए: यूँ ही दीवाना बने रहिये.

बहरहाल आलोचना का दौर थमा नहीं और रवीश के बहुजन-भक्त तरह-तरह से ताने मारते हुए मेरा मखौल उड़ाते रहे. इस क्रम में मेरे एक बहुत बड़े कद्रदान, जो अतीत में कई बार रवीश को लेकर की गयी मेरी टिपण्णी पर आपा खोते रहे हैं, इस बार भी उखड गए और शेष में ‘चश्मा बदलने का उपदेश दे डाले.’. मैंने उनको समझाते हुए जवाब दिया,’ सर, वर्षों पुराना चश्मा आज भी मेरा पहले की तरह परफेक्ट काम करता है. बड़ा ताज्जुब होता है जब कभी डाक्टरों से आँख दिखता हूँ , वे नंबर तक चेंज नहीं करते . आश्चर्य है 68 की उम्र में अब बिना चश्मे के भी काम कर लेता हूँ.सॉरी सर , दुसाध के पास बहुत-बहुत खास दृष्टि है , जिसके कारण जिस व्यक्ति का जमाना दीवाना है, उसकी चालांकी दुसाध पकड़ लेता है. यह नजर कुदरत सबको नहीं बख्स्ती . बाकी अपने हीरो पर खुश होने पहले यह जान लीजिये कि पुरस्कारों के पीछे राजनीति होती है. अगर योग्य व्यक्ति को सम्मानित करना ही पुरस्कार देने वाली कमेटियों का लक्ष्य होता तो रवीश की जगह कुछ और लोगों का भी नाम हो सकता था: शायद वह नाम आपके मित्र दुसाध का भी हो सकता था. आपको बता दूं कि आपका तुच्छ मित्र दुसाध भारत में पत्रकारिता का सारा रिकॉर्ड ही ध्वस्त कर चुका है. आपको यह भी पता है की जितने मुद्दे पर दुसाध अधिकारपूर्वक लिख सकता है, वैसा करने वाला भारत में कोई पैदा ही नहीं हुआ. जिस भाजपा के खिलाफ थोडा लिखने-बोलने पर लोग हीरों बन जाते हैं, उस भाजपा के खिलाफ जितना लिखा हूँ, भारत का बड़ा से बड़ा भाजपा विरोध पत्रकार भी 25% तक नहीं लिखा होगा.पर मैं आज तक कभी पुरस्कारों के लिए एप्लाई ही किया. लेकिन कोई भी मुझे सम्मानित करने के लिए आगे भी नहीं आया. अगर योग्य को ही सम्मानित करना समितियों का मकसद होता तो दुसाध को कबका ज्यादा नहीं तो कम से कम 5000 का पुरस्कार मिल ही गया होता. लेकिन नहीं मिला क्योंकि पुरस्कार देने वालों को पकड़ना पड़ता है, लॉब्बिंग करनी पड़ती है, जिसके लिए अपना स्वाभिमान न तो एलाऊ ही करता है और न यह करने के लिए अपुन के पास समय है. अतः रवीश को जो मिला है, उसे राजनीति और लॉब्बिंग से परे न समझें’

बहरहाल मैंने चश्मा बदलने का उपदेश देने वालों को दूसरे पुरस्कारों की भाँति मैग्सेसे में भी राजनीति और लॉब्बिंग देखने का इसलिए हिदायत दे डाला क्योंकि आमतौर पर ऐसा ही होता है. किन्तु मैग्सेसे के पीछ कार्पोरेट जगत की मंशा कुछ ज्यादे ही चौकाने वाली है, इसका इल्म नहीं था. इल्म हुआ सोशल मीडिया पर प्रसंगवश अरुंधती राय और सुयश के लेख पढ़कर . लोगों की दीवानगी बढ़ते देख कुछ लोग ने अरुंधती राय और कई अन्य लोगों के पुराने लेख डाले जिनमे प्रमाणित किया गया था कि राकफेलर द्वारा मेगसेसे के फंडिंग के पीछे की मंशा एक खास किस्म के एक्टिविज्म को बढ़ावा देने की रही है. मैग्सेसे के पीछे के घृणित इतिहास को देखते हुए स्त्रीकाल के संपादक को यहाँ तक शक हो गया कि रवीश शायद यह ग्रहण ही न करें. राकफेलर द्वारा दिए जाने वाले पुरस्कारों के पीछ की राजनीति का खुलासा किये जाने के बावजूद लोगों पर कोई फर्क नहीं पड़ा . इस बीच लोगों का अतिरेक देखते हुए चर्चित पत्रकार महेंद्र यादव Mahendra yadaw ने लिखा,’अगर यही मापदंड हैं, तब तो चर्चित लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता, डाइवर्सिटी मैन ऑफ इंडिया श्री H L Dusadh Dusadh को तो नोबेल प्राइज़ बहुत पहले मिल जाना चाहिए था। सरकार और व्यवस्था पर सवाल उठाने का जोखिमपूर्ण साहस वे बरसों से करते आ रहे हैं।‘मेरे अपने ही बहुजन मित्रों ने जिस तरह रवीश को लेकर मेरा माखौल उड़ाया था, वैसी स्थिति में Mahendra yadaw सर का पोस्ट भारी राहत पहुँचाया . इसलिए मैंने लिखा,’आभार. आपका यह पोस्ट ही मेरे लिए नोबेल है.
मित्रों , मैं समय-समय पर लिखता रहा हूँ,’ वैसे तो मैं लेखन को एन्जॉय करता करता हूँ, इसलिए पुरस्कार मेरे लिए मायने नहीं रखते .किन्तु पुरस्कार मिले भी तो नोबेल के नीचे का न हो.’ मेरी इस दाम्भिक घोषणा का विरले ही किसी ने अबतक मजाक उड़ाया हो. अच्छा लगा यादव सर ने जब मुझे नोबेल का पात्र बताया, किसी ने खुलकर मखौल नहीं उड़ाया . अधिकाश लोगों ने ही उनके सुझाव का समर्थन किया. यादव साहब के इस पोस्ट पर जिस सहजता से लोगों ने सकारात्मक कमेन्ट किया, उससे लगा कि रवीश-प्रेम में पूरा बहुजन अपना संतुलन नहीं खोया है.
लेकिन mahendr yadaw का ज्यादे मारक रहा यह पोस्ट -“Harnessing journalism to give voice to the voiceless.”
ये Voiceless कौन हैं? कौन-सा तबका है जो बोल ही नहीं पाता, जिसके पास आवाज नहीं है।
कमेटी मेंबरो, आपको गलत जानकारी दे दी गई है। इंडिया में कोई भी वॉइसलेस नहीं है। हर तबके में जबरदस्त मुखर लोग हैं। बस, उनको बोलने का मौका नहीं मिल पाता। यहां लोग voieless नहीं, mike-less हैं, plateform-less हैं। इस देश के करोड़ों लोगों को वॉइसलेस कहना तथ्यात्मक रूप से गलत भी है और अपमानजनक भी। अपने पुरस्कार आप जिसे चाहे बांटें, लेकिन हमें Voiceless न कहें। यहां भी हम voice उठा ही रहे हैं न!
भारत में “to give voice to the voiceless’ का मतलब केवल यही हो सकता है कि इन अनसुनी फरियादों को बोलने का अधिक से अधिक मौका दिया जाए..ये नहीं कि उनकी तरफ से खुद ही बोल लिए और कह दिया कि हो गया काम.’

बहरहाल जब मैं यादव सर के पोस्ट पर लोगों का कमेन्ट एन्जॉय कर रहा था, तभी मेरी निगाह एक ऐसे युवा बहुजन लेखक के पोस्ट पर पड़ी जो मेरे मुरीद हैं और मैं उनका. उन्होंने दिल खोलकर रवीश को भूरि-भूरि बधाई दिया था, जिससे मुझे आपत्ति नहीं थी. आपत्ति इस बात से थी कि उन्होंने बहुजन बुद्धिजीवियों को निशाने पर ले लिए थे , जोकि मुझे अनुचित लगा.क्योंकि मुझ जैसे दो-चार को अगर अपवाद मानकर छोड़ दिया जाय तो आम से लेकर खास बहुजनों ने मुक्त कंठ से उनकी उपलब्धि को सराहा था. इस बात को याद दिलाते हुए मैंने उन्हें जवाब दिया,’अच्छा कहे, ‘ जहाँ गाँछ न बृक्ष तहां रेण प्रधान’. वैसे मुझे नहीं लगता कि कुछ बहुजनों को इससे दुःख लगा है. व्यक्तिगत रूप से मैं ही वह व्यक्ति हूँ जिसने रवीश और कन्हैया को लेकर हमेशा सवाल उठायें हैं, बाकि लोग लिहाज करते रहे हैं. दुःख तब लगता है जब सामने वाले प्रतिस्पर्द्धी हो. हाँ मुझे हमेशा ऐसे व्यक्तियों से चिढ रही है, जिन्हें योग्यता से अधिक पुरस्कार मिलता है. अब आप देखों न सुबह से रवीश के प्रति जिस दीवानगी का इजहार हमारे बहुजन तक कर रहे हैं, क्या वह अति नहीं है. इसकी पत्रकारिता पर सवर्ण भले ही लट्टू हों, बहुँजनों को संतुलित रहना चाहिए. बेसिकलि रवीश सवर्णवादी सत्ता का सेफ्टी वाल्व ही है. ऐसे व्यक्ति को क्रान्तिकारी की भांति सम्मानित होते देख मुझे खीझ होती है.’. शायद उनको भी लगा कि रवीश के मामले में कुछ अति हो रहा है तो उन्होंने संतुलन साधने के लिए लिखा,’ H L Dusadh Dusadh सर आपकी वह क्षमता है जो 2- 4 रविश को नाप दो. और रविश को जो मिला है वह सिर्फ व्यक्तव्य का कमाल है जैसे मोदी का.. वरना कतई उसके हक़दार नही वो…..और आप! आप में न सिर्फ वह क्षमता है बल्कि आप उस मुकाम पर हैं जहां 2-4 रवीश आपके अस्सिटेंट रहें।‘ उनका यह प्रत्युत्तर दखकर चेहरे पर मुस्कान खेल गयी.

बहरहाल रवीश के मैग्सेसे से सम्मानित होने पर जो सर्वोत्तम टिपण्णी देखने को मिली, वह सुप्रसिद्ध बहुजन लेखक DrVijay Kumar Trisharan की रही. उन्होंने लिखा- दिलीप मंडल भारतीय पत्रकारिता में बहुजन समाज और राष्ट्र हित के मुद्दे का प्रखर आवाज रहे हैं, इनकी बेबाक टिप्पणी, डिबेट हर किसी को उद्वेलित करता है। समिति की नज़र इन जैसे पर मैग्नेसे एवार्डके लिए क्यों नही पड़ती? मेरा मानना है कि समिति एवार्ड के लिए ऐसे नामो पर विचार करती है, खास कर भारत के संदर्भ में, जो शासक वर्ग के लिए पसंदीदा और बहुजन समाज के लिए बेझिझक ढंग से स्वीकार्य (Easily Acceptable)हो। जो शासक वर्ग के चहेते होते है, वे हमेशा मुद्दों के उठाने के मामले में मोडरेट रास्ता चुनते है। बहुजन समाज की सब प्रकार की दुर्दशा का मूल ब्राह्मणी व्यवस्था याने वर्ण व्यवस्था है जो ब्राह्मणी धर्म का मूलाधार है। इस पर चोट किये बिना कोई बहुजन समाज को सामाजिक न्याय नही दिला सकता। दिलीप जी इस पर ही चोट करते हैं। बाकी कोई नहीं। यदि समानता और बंधुत्व के आधार पर राष्ट्र का निर्माण होता है तो दिलीप मंडल जैसे मीडिया मैन की भूमिका अहम मानी जायेगी, ऐसे में वे मैग्सेसे एवार्ड के निर्विवाद कैंडिडेट ठहरते हैं।बहुजन समाज प्रायः किसी मुद्दे को सूक्ष्मता पूर्वक अध्ययन किये वगैर भावना वश अपनी राय प्रकट करने में जल्दीबाजी कर देता है। कुछ तो सबकुछ समझते हुए भी सतही उदारमना बनने का यश बटोरने के होड़ में ऐसा कर बैठते है।‘
XXXXXरवीश रवीश रवीश
रवीश कुमार को मैग्सेसे का अवार्ड बेजुबानों की जुबान बनने के लिए दिया गया है. अगर बेजुबानों की जुबान बनने के लिए इस देश के किसी पत्रकार को कोई सम्मान मिलना चाहिए तो पहला नाम उस दिलीप मंडल का आएगा, जिन्हें डॉ विजय कुमार त्रिशरण ने ‘मैग्सेसे का निर्विवाद कैंडिडेट’ बताया है.’ दिलीप मंडल ने जिस तरह हजारों साल से शिक्षा से बहिष्कृत लोगों को सोशल मीडिया पर जुबान खोलने के लिए प्रेरित किया है, उसका कोई जवाब नहीं. मुझे नहीं लगता पूरे विश्व में बेजुबानों को मुखर करने का जो काम दिलीप मंडल ने किया है, उसका कोई जोड़ है. उनके सौजन्य से सोशल मीडिया पर मुह जैसे लाखों पत्रकार पैदा होकर वंचितों के अधिकारों की बात बुलंद आवाज में उठा रहे हैं. उन्होंने जिस तरह लोगों को मुखर होने के लिए प्रेरित किया है, वह मीडिया जगत की शायद इकलौती घटना है, इस काम के कारण दिलीप मंडल मैग्सेसे ही नहीं नोबेल पुरस्कार के निर्विवाद कैंडिडेट के रूप में नजर आते हैं. क्या आपको दुसाध के इस दावे में दम नजर आता है?

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