यूपी में प्रियंका को कांग्रेस का चेहरा बनाने की मांग के मायने

●अजय प्रकाश सरोज

देश मे लोकसभा का चुनाव कांग्रेस भले ही बुरी तरह हार गई हो लेकिन उत्तर प्रदेश में गठबंधन की हार से कांग्रेस रणनीतिक रूप से सफल हो गई है। कांग्रेस को अपनी परंपरागत दो सीट रायबरेली और अमेठी में से एक राहुल गाँधी की अमेठी हारने से बड़ा झटका लगा हैं। इस बड़े झटके से गाँधी परिवार को भी आत्म चिंतन करने को मजबूर करेगा की अगर क्षेत्र की जनता से सीधे संवाद स्थापित करने में चुके तो नई पीढ़ी के मतदाताओं को रोक पाना मुश्किल हैं । अब गाँधी परिवार द्वरा किये गए कार्यो को नई पीढ़ी भूलती जा रहीं। उनमें भाजपा आईटी सेल के तर्को-कुतर्को द्वरा फैलाये जा रहें भृम से निकल पाने की क्षमता तो हैं लेकिन दिलचस्पी नही !

जनता और कार्यकर्ता-

अब राजनीति में तरुड़ाई लंबे संघर्ष के बजाय कुछ पाने की जल्दबाजी में हैं। पूंजीवाद की शिकार हो चुकीं भारतीय राजनीति में पद ,पैसा और भौकाल ज्यादा मायने रखने लगा हैं। राजनीतिक दलों के लिए कार्यकर्ता ही रीढ़ होता हैं लेकिन थके हुए कांग्रेसी कार्यकर्ताओं में अपने बूते जनता को समझाने की कूबत नही बची । कार्यकर्ता कार्पोरेट कम्पनियों के कर्मचारियों जैसा ब्यवहार करते हैं और बड़े नेताओं के साथ सेल्फी लेने की जुगाड़ में रहता है ।

बड़े पदाधिकारीयों की ज़मीनी पैठ घटी –

कांग्रेस के ज्यादातर बड़े नेताओं के पास उनके ही क्षेत्र में ज़नता के बीच से चर्चा खत्म हो गई है । उनके बारें में कभी कभार ऐसी चर्चा भी हुई तो लोग कहते है कि अब बूढ़े हो गए हैं ।अब तो अपने बेटे और बेटी को भी राजनीति में सेट नही कर पा रहें है। सवाल यहीं से खड़ा होता हैं कि खुद बूढ़े हो चुके नेताओँ को पार्टी से ज्यादा खुद के सन्तानो की चिंता हैं। उन्हें यह डर बना रहता हैं कि संघर्ष करने वाला नया कोई नेता बनेगा तो मेरा क्या होगा ? उन कुंडली मार नेताओँ से त्रस्त हुआ राजनीति इच्छाशक्ति वाला युवा दूसरें पार्टियों में चला जाता हैं।

आपसी वर्चस्ववाद की जंग –

कांग्रेस के सरकारों में राजनीतिक लाभ लेकर मजबूत हुए नेताओँ ने अपने पीछे जो फौज खड़ी की उन पर कांग्रेसी विचारों का रंग नही चढ़ने दिया बल्कि कांग्रेस के संसाधनों का इस्तेमाल करके खुद के समर्थक तैयार किये । इन समर्थकों से अपनी जय जयकार कराए । कभी कांग्रेस की नीतियों और योजनाओं के बारें में प्रशिक्षण नही दिया गया। इस तरह के बने समर्थक नेताओँ तक सीमित रहें । इनमें बड़े स्तर पर ख़ेमेबाजी चलती रहती हैं। जो चुनाव के समय विरोधियों को लाभ पहुँचाने में मदतगार साबित होते हैं।

चुनावी चंदे का बंदरबांट –

यह सर्वविदित है कि कांग्रेस चुनाव के समय अपने प्रत्याशियों को लड़ने के लिए पैसों की मदत करता हैं । पार्टी फंड के इस पैसों पर चुनाव प्रभारियों , जिलाध्यक्षों सहित स्थानीय बड़े कांग्रेसी नेताओं की नजऱ रहती हैं। यह पैसा भले ही अब प्रत्याशी के खातें में आये लेकिन इस पैसे की बंदरबांट की योजना पहले से ही बन चुकी होती हैं, और पुरें चुनाव तक प्रत्याशी और पदाधिकारियों में खींचातानी चलती रहतीं है।जो चुनाव पर भारी नकारात्मक असर डालता हैं।

यूपी में कांग्रेस कि संभावना —

80 के दशक के बाद उत्तर प्रदेश में क्षेत्रीय दलों के उभार से कांग्रेस का पतन शुरू हुआ था जो गठबंधन के रूप में कमजोर हो गया हैं। अब जो पार्टी यूपी में भाजपा के गलत नीतियों के विरुद्ध संघर्ष करेगी जनता में उसकी पकड़ मजबूत होगी और चुनाव में भाजपा के विपरीत मतों का लाभ भी पायेगा ।

प्रियंका गाँधी वाड्रा का हो सकती हैं मज़बूत विकल्प-

लोकसभा चुनाव दौरान गठबंधन में शामिल न करने से सपा बसपा को भारी नुकसान हुआ हैं। कई सीटों पर कांग्रेस उम्मीदवारों के कारण ही गठबंधन प्रत्याशियों को हार का मुंह देखना पड़ा।पश्चिमी यूपी के प्रभारी रहें ज्योतिरादित्य सिंधिया के उस बयान को याद करें तो कांग्रेस की भविष्य स्पष्ट होती नजर आती हैं जिसमे उन्होंने कहाँ था कि हम जल्दबाजी में नही हैं गठबंधन के बजाए अकेले चुनाव लडेंगे और कांग्रेस को मजबूत करेंगे । चुनाव के दौरान प्रियंका का भी यही रुख रहा हैं। कांग्रेस अपनी उस रणनीति में सफल हैं ।

कांग्रेसी नेताओं नें यूपी में प्रियंका को चेहरा बनाने की जो माँग की हैं उससे प्रियंका को पीछे नही हटना चाहिए । क्योंकि कांग्रेस के पास ज़मीनी कार्यकर्ता नही हैं प्रियंका के आने से ज़मीनी कार्यकर्ताओं को प्रोत्साहन मिलेगा । प्रिंयका के नेतृत्व में ही कांग्रेस यूपी में पुनर्जीवत हो सकती हैं,और आगामी 2022 के विधानसभा चुनाव के जरिये सत्ता के शिखर पर पहुँच सकती है बशर्ते कांग्रेस में आमूल चूल परिवर्तन की जरूरत हैं। साथ ही यूपी में बढ़ते अपराध , लोकसेवा आयोग में भ्रष्टाचार जैसें गम्भीर मुद्दों के साथ जनांदोलन को धार देनें की आवश्यकता हैं।

लेखक : पत्रकारिता एवं जनसंचार के शोधार्थी है।

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