सहारनपुर जातीय दंगों का खलनायक है सांसद फूलन देवी का हत्यारा शेर सिंह राणा !

सीन -1 . 5 मई , सुबह के नौ बज चुके हैं. सहारनपुर के शिमलाना गांव में महाराणा प्रताप जयंती समारोह मनाया जा रहा है. इस समारोह के मुख्य अतिथि शेर सिंह राणा हैं. जी हां वही शेर सिंह राणा जो सांसद फूलन देवी के हत्यारे हैं. फिलहाल जेल से जमानत पर बाहर है.

समारोह में तकरीबन 1000 लोग उपस्थित हैं. इसी बीच शेर सिंह राणा के मोबाइल की घंटी बजती है और उन्हें सूचना दी जाती है कि पास के शब्बीरपुर गांव में महाराणा प्रताप की शोभायात्रा निकालने को लेकर ठाकुरों और जाटवों में झगड़ा हो गया और तीन चार ठाकुर घायल हो गए है. इसके बाद शेर सिंह राणा ने मंच पर मौजूद लोगों से शब्बीरपुर चलने को कहा.

भीड़ को भड़काया राणा ने-

मंच पर मौजूद लोगों ने मना करते हुए कहा कि इससे स्थिति बिगड़ सकती है. फिर शेर सिंह राणा ने खुद माइक थामते हुए कहा कि मैं कायरों की तरह यहां बैठा नहीं रह सकता. जिसे चलना हो चले . अगर कोई नहीं जाएगा तो वो अकेला ही शब्बीरपुर जाएगा. इतना सुनते ही एक हजार से ज्यादा लोगों की भीड़ शब्बीरपुर गांव की ओर चल दी. सबसे पहले इस भीड़ ने रास्ते में पड़ने वाले बाल्मीकि मंदिर को निशाना बनाया. फिर चुन-चुन कर जाटव जाति के लोगों के घरों को निशाना बनाया गया.
अगर सभी तथ्यों की सूक्ष्म पड़ताल की जाए तो ऐसा लगता है कि किसी ने सहारनपुर हिंसा की प्लानिंग बड़े ही शातिराना अंदाज में पहले ही कर ली थी. कुछ ऐसे तथ्य हैं जो इस बात का इशारा करते हैं कि सहारनपुर हिंसा एक क्षणिक आवेश की घटना नहीं थी , बल्कि इस घटना को पूरी प्लानिंग के तहत अंजाम दिया गया.

पहली बार मनाई जा रही थी महाराणा प्रताप जयंती- 

सहारनपुर के शिमलाना गांव में पहली बार महाराणा प्रताप जयंती मनाई जा रही थी. इस जयंती को इतने बड़े स्तर पर मनाया जा रहा था कि इसमें यूपी, हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली, एमपी जैसे राज्यों के ठाकुर समाज के लोगों को आमंत्रित किया गया. ऐसे में सवाल यह उठता है कि शिमलाना जैसे छोटे से गांव में इतने बड़े पैमाने पर कार्यक्रम को आयोजित करने के पीछे क्या मकसद हो सकता है? इस कार्यक्रम का पैसा किसने दिया. जबकि इस कार्यक्रम को करने के लिए गांव के ही ठाकुर जाति के प्रधान को विश्वास में न लेने के कारण वो नाराज है.

इसी कड़ी में दूसरा तथ्य ये भी है कि शिमलाना और आसपास के गांव में कुछ समय पहले से राजपूत रेजीमेंट बनाने के नाम पर ठाकुर जाति के युवाओं को संगठित किया जा रहा था.

इसी कड़ी में तीसरा तथ्य ये भी है कि हमलावरों की भीड़ में कुछ लोग अपने हाथों में केमीकल से भरा हुआ गुब्बारा लेकर चल रहे थे. ये गुब्बारा वो जहां पर भी मार रहे थे उससे आग लग रही थी. शब्बीरपुर में घरों में आग लगाने के लिए माचिस का इस्तेमाल नही किया गया. वहां किसी कैमिकल से ही आग लगाई गई. सीमेंट की दीवारों पर जगह -जगह कैमिकल के काले धब्बे देखे जा सकते हैं.

ऐसे में साफ है कि कोई सहारनपुर हिंसा की तैयारी पहले से कर रहा था. वरना इस तरह से कैमिकल के गुब्बारें कहां से भीड़ के पास आए. ये सहारनपुर हिंसा के प्रयोजित होने का सबसे बड़ा सबूत है.

इसके अलावा गांव में केवल जाटव जाति के ही लोगों के घर जलाए गए. जबकि जाटव जाति के लोगों के घरों के पास ही नाई,धोबी,और बाल्मीकि जाति के लोगों के भी घर हैं, उन घरों को हिंसक भीड़ ने नहीं जलाया. इन तथ्यों से साफ है कि सहारनपुर हिंसा पहले से जाटव जाति से खुन्नस निकालने के लिए रची गई थी.

ये सारे सबूत इस बात के लिए इशारा करते हैं कि इस हिंसा का सूत्रधार कोई और नहीं बल्कि फूलन देवी का हत्यारा शेर सिंह राणा ही है . पर हैरत की बात है कि पुलिस इस हिंसा में उसका नाम तक लेने से बचती दिख रही है.

साभार फारवर्ड प्रेस 

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